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Monday, August 31, 2020

"STEAM ENGINE" OLD MEMORY

"STEAM ENGINE" OLD MEMORY"
Indrajeet singh Kurram
Oil cooler on Canvas
Size. 36" X 56" inches 
2016

"STEAM ENGINE" OLD MEMORY" Indrajeet singh Kurram Oil cooler on Canvas


**"स्टीम इंजन" (पुरानी यादें) चित्रकला का कलात्मक दृष्टिकोण**

**चित्रकला:** स्टीम इंजन (पुरानी यादें)  
**कलाकार:** इन्द्रजीत सिंह  
**वर्ष:** 2016  

"स्टीम इंजन" शीर्षक से चित्रित इस कलाकृति मैंने सन 20 16 में रायगढ़, किरोड़ीमल नगर में रहते हुए बनाया था |उस समय मैं रेलवे में जूनियर इंजिनियर मैकेनिकल में कार्यरत था, और एक स्टीम इंजन बनाना चाह रहा था | चित्र में  पुरानी यादों को जीवंत किया है इसमें एक बैलगाड़ी के साथ हल लेकर जाता किसान मटके में पानी ले जाती महिलाएं और ट्रेन को देख रोमांचित होते बच्चे के साथ एक काल्पनिक प्राकृतिक दृश्य को दिखाने की कोशिश की है |। आयल पेंटिंग से कैनवास में बने इस चित्र में एक पुराने स्टीम इंजन का चित्रण किया गया है, जो बीते समय की यादों और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। 

**चित्र का विवरण:**

इस चित्र में स्टीम इंजन को एक प्रमुख स्थान पर दर्शाया गया है, जो अपने समय का प्रतीक है। इंजन से निकलता हुआ धुंआ, उसका भारी-भरकम लोहे का ढांचा और इंजन के पहियों की विस्तृतता, यह सब मिलकर उस युग की तकनीकी प्रगति और जीवनशैली को प्रदर्शित करते हैं। चित्र में धुंआं और रंगों का गहरा प्रयोग किया गया है, जो पुरानी यादों और स्मृतियों की धुंधली परछाई को दर्शाता है।

पृष्ठभूमि में, धुंधले और गहरे रंगों का इस्तेमाल किया गया है, जो उस समय के वातावरण और उसकी गंभीरता को प्रकट करते हैं। यह दृश्य मानो हमें समय के उस दौर में वापस ले जाता है, जब स्टीम इंजन परिवहन का एक प्रमुख साधन हुआ करता था। 

चित्र में इंजन के रंगों और उसके विवरण में अद्भुत सटीकता है, जो इस बात को दर्शाता है कि कलाकार ने इस चित्र को बड़े प्रेम और समर्पण के साथ बनाया है। इंजन के धातु के हिस्सों, पहियों, और धुंए में की गई बारीकियों से कलाकार की तकनीकी समझ और उनके पुराने समय के प्रति सम्मान की भावना प्रकट होती है।

**कलात्मक दृष्टिकोण:**

यह चित्र न केवल एक तकनीकी युग का प्रतीक है, बल्कि यह बीते समय की यादों और नॉस्टेल्जिया का भी प्रतीक है। "स्टीम इंजन" के माध्यम से, कलाकार ने एक ऐसी दुनिया का चित्रण किया है जो अब अतीत का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन जिसकी गूंज अभी भी हमारे दिलों में बसी हुई है। 

इस चित्र में प्रदर्शित धुंआं और गहरे रंग, समय के साथ फीकी पड़ती यादों को व्यक्त करते हैं, वहीं इंजन की स्थिरता और मजबूती, उन यादों के महत्व और उनके प्रभाव को दर्शाती है। यह कलाकृति हमें उस युग की सादगी और उसकी महानता का एहसास कराती है, साथ ही यह भी बताती है कि कैसे समय के साथ तकनीकी प्रगति ने हमारी दुनिया को बदल दिया है।

**निष्कर्ष:**

"स्टीम इंजन" एक भावनात्मक और ऐतिहासिक कलाकृति है, जो बीते समय की यादों को संजोए हुए है। यह चित्रकला न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे अतीत और उन अनुभवों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को भी व्यक्त करती है। यह कलाकृति उस युग की एक अमूल्य धरोहर के रूप में हमेशा याद रखी जाएगी।

Sunday, August 16, 2020

GOLDEN RIVER an acrylic painting on canvas

 "GOLDEN RIVER"
Indrajeet singh Kurrm
Acrylic on Canvas board
  Size 28" x 32
   2020
                 
painting GOLDEN RIVER Acrylic on canvas
"GOLDEN RIVER" Indrajeet  Singh, Acrylic on Canvas board 2020 (28"X32")

Sunday, July 28, 2019

Travel must be in life only

यात्रा जरुरी है जीवन में 
                        
                          कहते है "लुढ़कते पत्थर पर कभी काई नहीं  जमती" सत्य है ,नदी में जो पत्थर स्थिर है उन पर तो अक्सर काई जम जाती है, परन्तु जो पत्थर नदी में लुढ़कता रहता है न केवल काई विहीन होता है, वरन चमकीला व सुन्दर आकर का भी हो जाता है।  कहने का तात्पर्य यह है की यदि मनुष्य भी नदी में लुढ़कते इस पत्थर के भांति स्वयं को नदी रूपी जीवन धारा में गतिशील रखे तो वह अपने विचारों को एक अच्छा आकार दे सकता है, ज्ञान में वृद्धि कर सकता है एवं अपनी अंतरात्मा में चमक उत्पन्न कर सकता है। बहने या लुढ़कने का मतलब यह नहीं की हम भी नदी में बहने लगें या जमीन  लुढ़कने लगें। बहने और लुढ़कने का मतलब है गतिशील रहना, कर्मशील रहना, प्रयास करते रहना। माँ के गर्भ से एक बच्चा संसार में एक लम्बी यात्रा कर पहुँचता है और इस संसार में उसकी आगे की यात्रा शुरू हो जाती है। घर से विद्यालय तक का सफर, विद्यालय से महाविद्यालय तक का सफर, महाविद्यालय से अच्छे व्यवसाय तक का सफर, और एक अच्छे व्यवसाय से एक अच्छी पहचान तक का सफर, और ये सफर तब तक चलता रहता है जब तक व्यक्ति गतिशील, कर्मशील रहकर सफलता के लिए प्रयास करता रहता है। मानव मन में जो कुछ भी उपजता है वह उसे प्राप्त करने के लिए प्रयासरत हो जाता है, उसके लिए वो विचारशील हो जाता है, उस विचार को कार्यान्वित करने के लिए क्रियाशील हो जाता है और उस कार्य के प्रगति से स्वयं को प्रगतिशील करता है। किसी को ज्ञान, कला, प्रेम,सुख, शांति रूपी प्यास क्रियाशील करती है तो किसी को धन-दौलत, नाम, ऐश्वर्य, समृद्धि, वर्चस्व, सत्ता रूपी प्यास क्रियाशील करती है। अतः वह व्यक्ति ज्यादा श्रेष्ठ है जो गतिशील रहता है अपेक्षा उस व्यक्ति के  जो स्थिर हो जाता है जो न तो अपने शरीर के सामर्थ्य का उपयोग करता है न ही अपनी बुद्धि का। और जो व्यक्ति इस संसार में  प्रगतिशील रहता है, जो हमेशा अपने उद्देश्य की ओर बढ़ता रहता है वह एक यात्री है, वह यात्रा कर  होता है। 
happy journey
" A TRAVELER ON TRAVEL " Pencil color on paper size 8" X 11" on 2019

                         जीवन की इस धारा में यात्री बनो और यात्रा करो, यात्रा करो ज्ञान के सागर में, यात्रा करो अनुभव की किताब में, यात्रा करो मन की पुकार की ओर, बस यात्रा करो।  जीवन में यात्रा का बहुत महत्त्व है, यह हमें कुछ दिखाती है, कुछ सिखाती है, कुछ एहसास कराती है और हमारी अंतरात्मा को खंगालती है जिससे हमें सुख दुःख, सही गलत की अनुभूति होती है। यात्रा होती है विचारों की, यात्रा  होती है अनभिज्ञता से ज्ञान की ओर, यात्रा होती है अन्धकार से प्रकाश की ओर, यात्रा होती है निर्धनता से सम्पन्नता की ओर, यात्रा होती है नास्तिकता से आस्तिकता की ओर। इसीलिए संसार में हुए सफल लोगों का इतिहास, महापुरुषों का इतिहास यात्राओं से भरा पड़ा है। जितनी बड़ी या महान विचार मनुष्य के मन में होगी, वहां तक पहुंचने का मार्ग भी उतनी ही कठिन और समय लेने वाली होगी।  इस संसार में हमारी यात्रा का प्रारम्भ बिंदु कहाँ था, हम प्रायः भूल जाते हैं और यात्रा का अंतिम पड़ाव कहाँ है, इसके बारे में भी विचार नहीं करते पर फिर भी हम चलते रहते है, यात्रा करते रहते हैं।
Relax
" TAKE REST WHILE TIRED " Pencil color on paper size 8" X 11" on 2019
                         हर मानव एक यात्री है और हर मानव के विचार एवं उद्देश्य  भिन्न है और इसीलिए सबकी यात्रा की दिशा अलग - अलग होती है परन्तु अक्सर लोग एक बने बनाये मार्ग का ही चयन कर उस ओर चलते है, जबकि कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अपना मार्ग स्वयं बनाते हैं।
जिस प्रकार विचारों का कोई अंत नहीं है उसी प्रकार यात्रा का भी कोई अंत नहीं है, तो बस यात्रा करो। थक जाओ तो हे मानव थोड़ा विश्राम करो, अपने किये यात्रा को स्मरण करो, उसका आकलन करो और उसे  अपने ज्ञान और अनभवों में   शामिल करो  फिर अपने उद्देश्य को याद करो और तरोताजा हो फिर उठो, चलना शुरू करो और यात्रा करो।                                                                                                                                                                                 इन्द्रजीत सिंह कुर्राम 

Saturday, August 18, 2018

shradhanjalee Atal Bihari Bajpayee ji

श्रद्धांजली अटल बिहारी बाजपेयी जी 

सन्देश यह क्या सुन गया, मेरा मानस पटल । 
विरक्त हो गया देह से, था जो भारत रत्न अटल । 

प्रवक्ता, वक्ता, बन कवि, देश की प्रगति को दिया बल । 
पोकरण में कर परमाणु परिक्षण, शक्ति दिया प्रबल । 

थर्रा दिया धरती को जिसने, जिनसे दुनिया गयी दहल । 
विरक्त हो गया देह से, था जो भारत रत्न अटल ।  
 
Bharat Ratan Atal Bihari Vajpayee ji


25 Dec 1924 - 16 Aug 2018


Wednesday, August 15, 2018

paisa chalta hai

paisa chalta hai
                                   पैसा चलता है 
एक आदमी बेरोजगार था और नौकरी की तलाश में बड़े शहर की तरफ निकल पड़ा। ट्रेन से उतरने पर उसे एक भिखारी मिला, जिसने बड़ी दुखी आँखों से उसे देखा और अपना हाथ उसके आगे कर दिया। उस आदमी ने कुछ सोचा और अपनी जेब से एक रुपया निकाल कर भिखारी के हाथ में रख दिया, और आगे बढ़ गया। भिखारी ने आदतन कुछ कहा और आगे बढ़ गया।भिखारी के पास एक रुपया और था, वह दो रूपये ले कर चाय वाले के पास गया और उसने दो रुपये की चाय पी ली। चाय वाले ने दो रूपये अपनी जेब में रखा और जब उस चाय वाले के पास बीस रुपये हो गए तो वह राशन की दुकान से एक किलो शक्कर ले आया। राशन दुकान में सेठ ने वह रूपये अपनी संदूक में रख लिए। सेठ के गल्ले में शाम तक हजार रूपये आ गए तो उसने उन रुपयों से तेल के पीपे ले लिए। तेल के पीपे वाले उस सेठ ने पर्याप्त पैसे हो जाने पर तेल निकालने वाली और बेचने वाली कंपनी से और माल मंगा लिया। इस तरह से उस बेरोजगार आदमी का एक रुपया एक हाथ से दूसरे हाथ होता हुआ आगे बढ़ता रहा।
उधर वह बेरोजगार आदमी काम की तलाश में दर- दर भटकता हुआ उस तेल बनाने वाली कंपनी तक पहुंच गया और उसे वहां तीन हजार रूपये महीने की नौकरी मिल गयी। काम करते -करते एक महीने बीत गए और उस आदमी को उसके काम की पहली पगार तीन हजार रूपये उसके हाथ में मिले।  रूपये हाथ में आने के बाद वो बहुत खुश हुआ और अपने इष्ट देव को धन्यवाद दे कहा " हे देव आपने आज से मुझे भी मेरी मेहनत की कमाई देना शुरू किया है, आशीर्वाद दो की मेरा यह धन अच्छे कार्यों में व्यय हो इस से  मेरा, मेरे परिवार का, मेरे समाज का, मेरे राष्ट्र का, विश्व का कल्याण हो। " इस तरह उस आदमी ने अपनी कमाई का सदुपयोग करना शुरू कर दिया। 
किसी को दिया गया धन या कहीं किया गया इन्वेस्टमेंट का एक रुपया भी कई गुना बढ़कर वापस ही मिलेगा। अगर हमने पैसे आने के बाद उसे कहीं भी इन्वेस्ट नहीं किया तो वह पैसा वहीँ रुक जायेगा वह बढ़ेगा नहीं। जिन स्थानों पर पैसों का लेन -देन जितनी तेजी से होता है वे स्थान ज्यादा प्रगति करते है अपेक्षा उन स्थानों के जहाँ पैसों का लेन देन कम होता है। 

Monday, January 15, 2018

bachpan kal, aaj aur kal


बचपन कल, आज और कल

"बचपन" इस शब्द को सुन कर मन प्रफुल्लित सा हो जाता है। मनुष्य जीवन का एक यादगार लम्हा जब वह इस सृष्टि में आ कर हॅसने-रोने के अलावा बोलना, चलना-फिरना, खेलना-कूदना आदि क्रियाओं के साथ अपने पैरों पर खड़ा होना सीखता है। बचपन की बचकानी हरकत, बचपन की शरारतें अच्छी हो या बुरी पर होती एकदम साफ मन से है। परन्तु बचपन कल और आज का बहुत बदल गया है, पहले हमारे पास समय था, हमारी इच्छाएं कम थी, हमारी परिधि कम थी, हमारी इच्छाओं का दायरा कम था, विज्ञान को समझने की कोशिश में थे, वस्तुओं के ब्रांड कम थे। इसलिए वो बचपन आज के बचपन से बिलकुल अलग था आज तेजी से बदलती इस दुनिया में किसी के पास पर्याप्त समय नहीं, खाने -पीने की ढेरों किस्में बाजार में उपलब्ध है,पर वो भूख और स्वाद नहीं, पहले हमारे पास मोबाइल नहीं था, टीवी के इतने सारे चैनल नहीं थे। सबसे बड़ी बात है की पहले किसी-किसी जगह ही कॉम्पिटिशन था, और आज हर जगह कॉम्पिटिशन देखने को मिलता है। हमारे बुजुर्गों का बचपन कैसे बिता? हमारा बचपन कैसे बिता? हमारे बच्चों का बचपन कैसे बीत रहा है? और उनके बच्चों का बचपन कैसा होगा? अगर आज इस पर ध्यान नहीं गया तो बचपन ही  समाप्त हो जायेगा। 
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है एक कच्चे मिटटी के घड़े जैसे, जिसे जिस आकर में ढालें ढल जाये। बाल मन को समझना आसान नहीं, क्योंकि एक बच्चा शब्दों-वाक्यों से परे सिर्फ भावनाओं को समझते है। कहते है बच्चों में भगवान् बसते है, और जिस प्रकार भगवान् भाव को समझते है उसी प्रकार बच्चे भी भाव ही समझते है। बाल मन को समझना आसान नहीं है फिर भी थोड़ा प्यार थोड़ा फटकार जरुरी है। बच्चों को यदि कुछ सिखाना चाहिए तो उन्हें जीवन जीने की कला सिखानी है। और जीवन को प्रकृति और प्रवृत्ति से सीखा जाना चाहिए। जिस प्रकार मौसम अलग-अलग है और प्रकृति मौसम के अनुसार व्यवहार करती है, जहाँ पतझड़ में वृक्ष अपने पत्ते त्याग देती है वहीँ पुनः बसंत में खुद को हरा -भरा कर लेती है। कभी तेज गर्मी तो कभी कड़ाके की सर्दी हर मौसम का अपना महत्व है। अगर प्रकृति में यह जलवायु परिवर्तन न हो या समय से न हो तो उसका सीधा असर अनाजों सब्जियों के पैदावार में पड़ता है, व्यक्ति के स्वास्थ पर पड़ता है। उसी प्रकार बच्चों को प्यार की जरुरत तो हमेशा रहती ही है पर उसके साथ साथ जरुरत पड़ने पर डांटना भी चाहिए, उनकी इच्छाओं की पूर्ति करना ठीक है पर इच्छाओं की अति पर लगाम होना चाहिए, उन्हें सुख सुविधाएं देना ठीक है पर उन्हें कठिन परिस्थितियों का बोध भी होना चाहिए। परन्तु आज हम क्या कर रहे है? अपने बच्चों के लिए हम बस और बस अच्छा और सबसे अच्छा ही चाह रहें है। हम चाह रहें है हमारा बच्चा सबसे अच्छे स्कूल में पढ़े, एग्जाम में वो सबसे अच्छे अंक अर्जित करे, खेल में भी सबसे आगे रहे, फिर डांस, म्यूजिक की क्लास भी जाये, टॉप के कॉलेज में एड्मिशन हो जाये, और टॉप की कंपनी में टॉप पोस्ट में सलेक्ट हो जाये। अरे बच्चा अभी ठीक से चलना भी नहीं सीख पाया है और हम उसका पूरा भविष्य देखने लग गए।अपेक्षाएं करना अच्छा है पर प्रकृति की उपेक्षा करना गलत है। एक समय था जब बच्चे लकड़ी, पत्थर, मिटटी से अपने खिलौने तलाश लेते थे, और आज कंप्यूटर टीवी और मोबाइल में गेम तलाशते है। पहले के बच्चे खेलते -खेलते पेड़ पर चढ़ जाते थे और फल तोड़कर खा जाते थे, कही भी नल में, हैंडपंप में या कुवें का पानी पीकर भी बीमार नहीं होते थे क्योंकि प्रदुषण कम था, और आज हाथ साफ कर खाने के बाद भी बीमार हो जाते है  क्योंकि प्रदुषण बहुत बढ़ गया है। हम खुद ही बच्चों को नाजुक बनाये जा रहे है जबकि प्रकृति ने उन्हें स्ट्रांग बनाये रखने की चीजें उपलब्ध करा रखी है, बस हम बच्चों को वहां पहुंचने नहीं देते। पहले बच्चे खुद ही भागते थे क्योंकि भागने में उन्हें मजा आता था, आज बच्चों को हम भगा रहें हैं ताकि वो मैडल ला सके। स्कूल में एडमिशन के समय पहले देखते थे की स्कूल पास में हो, बजट में हो सामर्थ्य में हो, और आज देखते हैं की स्कूल का मीडियम कौन सा है उसकी बिल्डिंग कितनी बड़ी है और उसका नाम कितना चल रहा है। पहले बच्चे स्कूल से निकल कर कुछ बड़ा कर जाते थे तो स्कूल का नाम रोशन होता था पर आज लोग ये सोच कर स्कूल चयन करते है की इस स्कूल से मेरे बच्चे का नाम रोशन होगा। आज के बच्चे ज्यादा तेज ज्यादा स्मार्ट है क्योकि उनको संस्कार देने वाले सिर्फ माता-पिता या गुरुजन ही नहीं बल्कि कंप्यूटर, मोबाइल और सोशल मिडिया भी उनके साथ है। 
अंत में बस इतना ही की बच्चों को केवल अच्छे साधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी देना है, मंजिल उन्हें खुद चयन करने दें बस उन्हें आप राह बताएं। दुनिया में बड़े-बड़े काम करने वाले बहुत है पर याद वे ही आते है जो अच्छे काम करते है। 
                                                                                                                                                                                                                                                                            इन्द्रजीत सिंह कुर्राम

Friday, December 25, 2015

aaryan

आर्यन
बात उन दिनों की है जब मै बेरोजगारी का अनुभव प्राप्त करते किसी नौकरी की तलाश में भटक रहा था। एक कंपनी थी जिसमे औजार बनते थे, वहां 1500 रूपए प्रति माह पर बात हो गयी। वहां मै केवल दो दिन ही काम पर गया, न पैसे कम ही थे न काम में कोई तकलीफ थी, फिर भी वहां मन नहीं लगा। अब फिर मै बेरोजगार था। एक मित्र की सहायता से मै एक स्कूल में पढ़ाने लगा 700 रूपए प्रति माह में। साइकिल से स्कूल जाता बच्चों को पढ़ाता और घर आकर खुद पढता। यहाँ पैसे कम जरूर थे परन्तु काम मेरे लिए संतोष दायक था, यहाँ मुझे दो सप्ताह हुए थे की एक मित्र की सहायता से मुझे एक दूसरा काम मिल गया। एक थर्मल पावर प्लांट तैयार हो रहा था इलेक्ट्रो स्टैटिक प्रिसिपिटेटर बनाने वाली एक कंपनी थी, मै वहां एक ठेकेदार के नीचे काम करने लगा। यहाँ पर मुझे 3000 रूपए प्रति माह तय किया गया। यहाँ से ही मुझे एक महीने काम करने पर 3000 रूपए मिले। कॉमिक्स किराये पर देकर, फोटोग्राफी कर और ट्यूशन देकर पैसे तो पहले भी बनाए थे परन्तु यह 3000 रूपए मेरी पहली कमाई थी। यहॉ भी मैं दो-तीन महीने ही काम कर पाया था और मन कुछ और करने को मचल रहा था अतः मैंने वह जॉब भी छोड़ दी और एक बैंक में एजेंट के रूप में काम करने लगा। बैंक का काम करते-करते मैंने न्यूज़-पेपर पर एक एड देखा और वहाँ बायो-डेटा लेकर चला गया और इंटरव्यू में सलेक्ट हो गया।
जब मैं इस जॉब के लिए रायपुर शहर के लिए निकला मेरे पास 1500 रुपए थे। घर से 200 किलो-मीटर दूर मैं जॉब करने आ गया।
मैं अपने सामान के साथ सीधे कंपनी में गया और ड्यूटी ज्वाइन कर काम में लग गया, मैंने अपने रहने की समस्या का किसी से जिक्र नहीं किया और शाम को ड्यूटी समाप्त होने पर मैं अपने सामान के साथ निकल पड़ा रहने का ठिकाना ढूंढने। मैं अस्थाई रहने के लिए किसी सस्ते से सस्ते लॉज की तलाश में था।  सामान लिए चलते -चलते मैं थक गया था, तभी एक रिक्शा मेरे पास आकर रुका। लड़के ने मुझसे पूछा  "कहाँ जायेंगे भैया " मैंने कहा  "नहीं ! … कहीं नहीं जाना है, मैं लॉज ढूंढ रहा हूँ "  उसने कहा  "चलिए न भैया मैं छोड़ दूंगा, कौन से लॉज में जायेंगे ?" मैंने कहा  "देखो अगर किसी सस्ते से लॉज में ले जा सकते हो तो बताओ"  उसने बैठने को कहा तो मैंने किराया पूछा, उसने तीस रूपए कहा मैंने कहा बहुत ज्यादा है, और मै आगे बढ़ने लगा तो उसने कहा भैया पच्चीस रूपये दे देना, मैंने कहा बीस रुपये में चलना है तो चलो, वह राजी हो गया और मैं रिक्शा में बैठ गया। मैं रिक्शा में बैठा और थोड़ी दूर गया तो उससे पूछा  "तुम्हारा नाम क्या है ?"  उसने अपना नाम आर्यन बताया। उसके बारे में  मैंने और जानकारी ली, उसने बतया वह ओडिशा से आया है और यहाँ पर उसके और भी रिलेटिव्स कुछ न कुछ काम धंधे में है। चलते-चलते  उसने भी मुझसे पूछा भैया आप कहाँ से आये है, आपको यहाँ कुछ काम है क्या ? मैंने कहा मै यहीं छत्तीसगढ़ का हूँ, और यहाँ पर काम के सिलसिले में आया हूँ।  वह मुझे पास  के ही एक लॉज में ले गया वहां 300 रुपये प्रति दिन किराया था, मैंने मना कर दिया। इसी तरह तीन-चार लॉज में हमने पता किया कहीं 300 तो कहीं 250 रुपये किराया था। मैंने आर्यन से कहा  "देखो आर्यन मेरे पास ज्यादा पैसे है नहीं और मुझे यहाँ कितने दिन रुकना पड़े पता नहीं। मुझे 100 रुपये किराया तक का लॉज चलेगा, पर शायद यह संभव नहीं, तुम एक काम करो मुझे रेलवे स्टेशन पर ही छोड़ दो मै रात वहीँ बिताऊंगा।" आर्यन ने कहा "भैया आप परेशान हो रहे हैं, रेलवे स्टेशन में आप सुरक्षित नहीं रहेंगे वहां पर आपका सामान चोरी हो सकता है और पुलिस वाले भी परेशान करते हैं। अच्छा एक काम करते है यहाँ से थोड़ी दूर मंत्रालय के पास मेरी माँ का होटल है वहां चल कर पहले खाना खाते हैं फिर माँ से कह कर कुछ बंदोबस्त करवाता हूँ।" मैं सोच रहा था की ये लड़का क्यों मुझे मेरे हाल पर छोड़ नहीं देता, क्यों ये मेरी समस्या के समाधान ढूंढ रहा है, इसमें जरूर इसका कोई स्वार्थ होगा, शायद किराया ज्यादा बनाने की सोच रहा होगा या कही ये मुझे ठगने के बारे में तो नहीं सोच रहा है। चलो जो भी हो मेरे पास कोई भी कीमती सामान तो है नहीं,ये सोचते मै उसके साथ चलता रहा और उससे बात कर उसके बारे में जानने की कोशिश करने लगा।
आर्यन ओडिशा के एक छोटे से गांव का था उसने जैसे-तैसे बारहवीं तक की पढाई पूरी कर ली थी। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण आज उसे इस शहर में आ कर रिक्शा चलाना पड़ रहा था।  यहाँ उसके गावं के और भी लोग थे जो किराये में रिक्शा ले कर अपनी जीविका चला रहे थे। वह भी अच्छी नौकरी करना चाहता था ,पर यह इतना आसान नहीं है जितना आसान सरकारी लेखा-जोखा में दर्शाया जाता है की स्कूल-कॉलेज की संख्या बढ़ गयी है, बेरोजगारी दर घट गयी है, लोगों को  रोजगार के बेहतर अवसर मिल रहे है। वास्तविकता इन सरकारी आंकड़ों से कोसों दूर है। पूछने पर उसने बताया की वह भी रात में देसी दारु पीया करता है क्योंकि दिन  भर शारीरिक परिश्रम से वो इतना थक जाता है की बिना पीये नींद ही नहीं आती। ये दारू भी अच्छी है जो भूत को भुलाने का काम करती है, भविष्य के चिंताओं को हरती है और वर्तमान में अच्छी आराम देती है।
मंत्रालय के बॉउंड्री वाल से लगे एक छोटे से गुमटी पर रिक्शा रुका, टीन और पोलीथीन से बने इस गुमटी में ही आर्यन की माँ का भोजनालय था जहाँ लोग सस्ते में खाना खाते थे। आर्यन ने अपनी माँ से खाना लगाने को कहा, उसकी बहन ने मुझे एक थाली में खाना परोस दिया। खाना स्टार वाले होटलों की तरह तो नहीं था परन्तु भूख भी लगी थी और 15 रुपये में इतना खाना की पेट को सुकून दे, बुरा भी तो नहीं था। मेरे खाना खाते तक आर्यन ने अपनी माँ को मेरी समस्या से अवगत करा दिया था। उसकी माँ मुझे पास के ही एक एस.टी.डी.-पी.सी.ओ.  के दुकान ले जाकर एक लॉज में फ़ोन लगाया, वहां एक कमरा खाली था। आर्यन को उसकी माँ ने पता दिया और मै रिक्शा में फिर चल पड़ा। हम लॉज में पहुंचे वहां 80 रुपये प्रति दिन किराया था, पर कुछ ही देर पहले कमरा बुक हो गया था। मैंने लॉज  वाले से पूछा क्या कल मुझे कमरा मिल जायेगा तो उसने कहा हाँ। मैंने वहां पास में ही एक दूसरा लॉज देखा 120 रुपये प्रति दिन  किराया था, कमरा ले कर सामान वहां रख कर मै निचे आर्यन के पास आया और उससे बोला "थैंक्स आर्यन तुमने मेरी आज बहुत मदद की है मेरी रहने की समस्या हल हो गयी है अब कल से मै यहाँ किराये का कमरा ढूंढ़ना शुरू कर दूंगा।  अच्छा अब बताओ तुम्हारा किराया कितना हुआ।" आर्यन ने कहा "भैया किराया रहने दो, आप इस शहर में नए-नए आये हो और अभी आपके रहने-खाने की उचित व्यवस्था भी नहीं है।" मुझे शर्मिंदगी हुई पहले वह मेरे लिए सिर्फ एक रिक्शा वाला था पर अब वह एक भाई एक दोस्त था। "फिर भी जो किराया बोला था वह तो ले लो " कह कर मैंने उसके हाथ में 30 रूपये रख दिए। आर्यन ने मुझे अपने घर के पास के एक दुकान का फ़ोन नम्बर दिया और अपना पूरा पता एक कागज पर लिख कर दिया और कहा की यदि उसके लिए भी कोई नौकरी हो तो बताये। आर्यन फिर मिलेंगे भैया कह कर चला गया और मै उसके बारे में सोचता लॉज के कमरे की तरफ बढ गया। 
दूसरे दिन मै काम पर गया फिर किराये में एक दस बाई दस का कमरा 800 रूपये महीने में देख कर वापस लॉज आ गया। दूसरे दिन लॉज छोड़ कर मै किराये के कमरे में आ गया। और ऑफिस के काम के दौरान पिकअप में सामान शिफ्ट करते वक़्त तेज हवा के झोकों ने मेरे कमीज की जेब से कुछ कागज हवा में उड़ा दिए।  उन कागजों के खो जाने का एहसास मुझे देर से हुआ और उन  कागजों में ही तो आर्यन का फ़ोन नम्बर और पता था जो अब मुझसे खो गया था। और एक हफ्ते ही मुझे बिलासपुर के ऑफिस में भेज दिया गया। मै आर्यन से दुबारा नहीं मिल पाया पर वो आज भी मुझे याद है। 
                                                                                                                                   इन्द्रजीत सिंह कुर्राम 

Friday, January 2, 2015

NEW YEAR


नूतन वर्ष

आओ उगते सूरज से, हम सब आशीष लें.
जीवन में वह हमारे शक्ति, ज्ञान, प्रेम भर दे.
 सबका ही कल्याण करे, सबका ही सम्मान मांगे।
देश प्रेम का हो जज्बा, मिलकर ऐसा विचार मांगे।
अज्ञानता के अँधेरे में, ज्ञान प्रकाश फैला दे.
शत्रुता वाले मन में, मित्रता के बीज उगा दे.
आज से बुराइयों का, कर दे हम त्याग।
दिल से दिल मिला सब, प्रेम का गायें राग.
जैसा बिता गत वर्ष हमारा, अच्छा हो उससे यह वर्ष। 
गम से दूर रहकर अपने, मन में भर लेँ हर्ष।  
खुशियो का वर्ष, समृद्धि का वर्ष, प्रेम का वर्ष, उन्नति का वर्ष। 
सबके लिए हो आनंद वर्ष, सबको मुबारक नूतन वर्ष। 

                                                                                              इन्द्रजीत  सिंह कुर्राम (इन्द्रभान )

Thursday, November 6, 2014

HE MANAV

                                              हे मानव 

                   हे मानव, तु अपनी पहचान बना। इस श्रृष्टि में तेरा भी अवतार हुआ है, किसी न किसी कार्य के लिये, कुछ न कुछ उद्देश्य की पूर्ति के लिए। बस यही सोच कर तू अपने प्रत्येक कार्य को अंजाम दे। तू अपने से बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त कर, कनिष्ठों मे स्नेह की वर्षा कर और अपने मित्रों से मित्रवत हो जा। कभी भी किसी का दिल न दुखा, किसी से कटु या असत्य वचन न कह, न क़िसी से रूठना ना किसी को रुठने देना। यह जिंदगी बहुत ही छोटी है, हर पल समय हमारे हांथों से फिसलती रेत क़ी तरह फिसलती जातीं है। समय एक सा कभी नहीं होता, वह तो परिवर्तनशील है। भूत, भविष्य से परे अपने वर्तमान को सुन्दर बनाओ।
                  हे मानव तु केवल भौतिक सुख की लालसा में न पड़कर मानसिक एवँ हार्दिक सुख के साथ जीवन व्यतीत कर। जो भौतिक सुख आज तुम्हारी है, हो सकता है कल किसी और का हो जाये, परन्तु जो तुम्हारे मन के, ह्रदय के भीतर है वो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा है। हे मानव जितना ध्यान तुम अपने मान-सम्मान का रखते हो उससे ज्यादा दूसरों के मान-सम्मान का रखो। कोशिश करो की हमसे कुछ ऐसा कार्य ना हो जाये जिसके लिए हमें आत्मग्लानि की अनुभूति होने लगे। क्रोध भी मनुष्य का स्वभाव है, परन्तु जहाँ तक हो सके अपने क्रोध पर नियंत्रण रखो अन्यथा व्यर्थ के विवाद ही सामने आएंगे। दूसरों की गलतियों में उनके इरादों को न ढूंढो क्योंकि मनुष्य गलतियों से भी कुछ न कुछ सीखता है। हे मानव तुम सब से प्रेम करो क्योंकि कोई जन्म से बुरा नहीं होता, परिस्थिति और माहौल उसे बुरा बना देती है, उसे सुधार सको तो सुधारो। अर्थात हे मानव तुम अपना जीवन सुधारो और इस श्रृष्टि में अपनी एक उत्कृष्ट छबी बनाओ।
                                                                                          इन्द्रजीत सिंह कुर्राम http://indrajeetart.blogspot.com/2014/09/he-manav.html

Friday, September 5, 2014

ishwar ek manshik samasya

ईश्वर एक मानसिक  समस्या 

                       हाँ,यह सत्य है कि ईश्वर आज उनके लिये एक मानसिक समस्या ही बनती जा रही है,जो इसे जानते नहीं समझतें नहीं। जिस प्रकार कस्तूरी मृग कस्तूरी की खोज में वन-वन भटकती रहती है,जबकि कस्तूरी तो उसके नाभि मे हीं मिलताहै, उसी प्रकार मनुष्य भी अन्यत्र स्थानोँ पर ईश्वर को तलाशता है जबकि ईश्वर तो उनकें मन मे, ह्रदय मे बसे होते हैं। तो क्या यह उनके लिए एक मानसिक समस्या नही है जो वे ईश्वर को अपने ह्रदय मे और हर प्राणी के ह्रदय मे ढूंढने के बजाय अन्यत्र स्थानो पर ढूंढते हैं? मनुष्य ईश्वर के सबसे करीब रहकर भी उनसे कोसों दूर क्यों है?
                       ईश्वर वह श्रद्धा है, वह मान-सम्मान है, वह विश्वास है जो हमेँ अपने माता-पिता, गुरुजनो और श्रेष्ठ महापुरुषों के लिये आदर भाव सिखाती है, सम्मान सिखाती है, प्रेम सिखाती है। तो क्या यह उनके लिए एक मानसिक समस्या नही जो मन्दिर, मस्जिद, चर्च या गुरूद्वारे जाते हैं और पूजा-अर्चना तो करते हैं परन्तु अपने माता-पिता, गुरुजनो, पूर्वजों और श्रेष्ठ महापुरुषों का  सम्मान नहीं करते? माता-पिता के वृद्ध होने पर उन्हे बोझ समझते हैं, गुरुजनों की अवहेलना करते हैं और अपने पूर्वजों को याद भी नहीं करते?
                     ईश्वर वह विश्वास है जो हमें खुद पर विश्वास ऱखने को कहतीं है, हमें अच्छे कार्यों के अच्छे परिणाम के लिये आशान्वित करतीं है। धैर्य धारण करने को कहती है और सफलता के लिये प्रेरित करती है। तो क्या यह उनके लिए एक मानसिक समस्या नही है जो सफलता प्राप्त करने के लिये कोई भी रास्ता अख्तियार कर लेते हैं? उन्हें अपनी ईमानदारी और मेंहनत वाला रास्ता ज्यादा कठीन, दुख भरा और लँबा लगनें लगता है। लोग जल्दी ही अपना धैर्य खो बैठते हैं उन्हे असफल होने का भय हमेशा बना रहता है, कई तो असफलता के डर से अपना कार्य ही शुरू नहीं करते क्योंकी उनकों स्वयं पर विश्वास ही नहीं होता है।  
                         ईश्वर वह मार्ग है जो हमें सत्य और अहिंसा अपनाने को कहती है।प्रेम से रहने और प्रेम ही बांटने को कहती है। सुख-दुःख में एक दूसरे का साथ देने को कहती है। गलतियों को क्षमा करने को कहती है। काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहँकार का त्याग करने को कहती है।तो क्या यह उनके लिए एक मानसिक समस्या नही है जो खुद को आस्तिक कहते हैं और झूठ, बैर और अपशब्द का अत्यधिक प्रयोग करते हैं। दूसरे के सुख और ऐश्वर्य से जलते हैं। सामने वाले को खुश देखकर खुद को दुखी कर लेते हैं। क्षमा के बजाय बदले की भावना रखते हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहँकार को अपने से अलग ही होने नही देते। 
                            ईश्वर सबसे श्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ है, सबसे ऊँचा, अनन्त विस्तृत है। वह विशाल से विशालतम और सूक्ष्म से सूक्ष्तम है। ईश्वर तेरा या मेरा नही है वह तो सबका है, सर्वज्ञ है, सर्वशक्ति मान है। और ईश्वर तो एक ही है तो क्यों उसे व्यक्तियों द्वारा विभाजित कर दिया गया है? क्यों आज लोग धर्म के नामों पर लड रहें हैं? क्यों हिन्दु, मुश्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, बौध्ध आदि अनेकोँ धर्म अपने हि अस्तित्व को स्वीकार करने को अडिग हैं? यदि अब इस धरती पर कोई महायुद्ध होगा तो संभवतः वह धर्म के नाम पर ही होगा।ईश्वर तो हमें मानवता के धर्म को स्वीकार करने को कहते हैं, मानव को मानव से प्रेम करने को कहते हैं, दुखियों की मदद करने को कहते हैं, बीमारों कि सेवा करने को कहते हैं, एकता के साथ रहने को कहते हैं। तो क्या यह सब मात्र किताबी बातें है।  क्यों ! क्यों हम आज धर्म को खंड-खंड कर रहें हैं? क्यों अमीरों और गरीबों के बीच में एक गहरी खाई क निर्माण कर रहेँ हैं? क्यों आदमी ही आदमी के खून का प्यासा हो जाता है? कहीं दंगे, कहीं आतंकवाद, कहीं नक्सलवाद, कहीं चोरी, कहीं डकैती, कहीँ अपहरण, कहीं फिरौती तो कहीं बलात्कार क्यों व्याप्त हो रहेँ हैँ।   
                      आखिर कब पूरा संसार एक ही सूत्र में बंध पायेगा? कब हम सभी अपने आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ मानवता, प्रेम और त्याग के लिये समर्पित कर पाएंगे। ईश्वर को नाम से नही बल्कि उनके आदर्शों से पहचान करेंगे। हर प्राणी के अन्दर शैतान रूपी राक्षस और भगवान रूपी देव वास करता है, अब यह प्राणी के ही ऊपर है कि वह अपने शैतान प्रवृत्ति को उजागर करे या देव प्रवृत्ति को। हमें जाति , रंग , नस्ल के भेद -भाव में न पड़ कर सभी को एक हो जाना चाहिए और ईश्वर को अपने मन में, मन से,  मन के भीतर देखना चाहिए।
                                                                                     *इन्द्रजीत सिंह कुर्राम

                                                                                                                                                                              http://indrajeetart.blogspot.com/2014/09/ishwar-ek-manshik-samasya.html

Tuesday, October 8, 2013

SUCCESS

सफलता 


सफलता  के  मायने  हर किसी के  लिए अलग-अलग होते हैं और इसका सीधा सम्बन्ध संतुष्टि से है। क्योंकि कुछ स्टूडेंट एग्जाम में ९५% अंक लाने के बाद भी संतुष्ट नहीं होते ,वही कुछ स्टूडेंट ४५% अंक आने पर खुद को सफल मानते है। कोई व्यक्ति अच्छी कंपनी में अच्छी जॉब पा कर भी खुश नहीं रह पाता, वही कोई छोटी सी नौकरी से ही अत्यंत खुश रहता है। कोई करोडो रूपये रहने के बाद भी परेशान रहता है, तो कोई हजारों रूपये में ही गृहस्ती अच्छे से चला रहा है। अतः सबके लिए सफलता के मायने अलग अलग है, बस व्यक्ति की सोच होती है की मैं सफल हो गया! या मैं असफल हो गया! कहा गया है "कर्म करो, फल की चिंता मत करो" और "सकल पदारथ हैं जग माहि, करमहीन नर पावत नाही " तात्पर्य यह है की हमारा फोकस हमारा ध्यान हमारे काम में होना चहिये, ना की उसके परिणाम में।
      SUCCESS         
   INDRAJEET SINGH KURRAM
20" X 15"
POSTER COLOUR ON PAPER
2002  
और इस संसार में हर प्रकार के सुख और साधन मौजुद है, बस उसे प्राप्त करने के लिए कर्म करना आवश्यक है। सफलता सिर्फ एक पड़ाव है, आगे फिर से संघर्ष का चढ़ाव है। अतः यदि हम किसी एक काम में सफल हो जाते हैं तो वही ठहर नहीं जाते,  बल्कि एक नए काम को तलाशते है। स्कूल, स्कूल के बाद कॉलेज, कॉलेज के बाद नौकरी, नौकरी में प्रमोशन, सुन्दर परिवार, अच्छा लिविंग स्टेंडर्ड, गाडी - बंगला, सुख - सुविधा के साधन ये सब सामान्यतः लोगों के उद्देश्य रहते ही है। इन सब से ऊपर भी कुछ लोगों की सोच होती हैं जो जन -सेवा करते है, देश -सेवा करते हैं। अब जिनके पास जितनी बड़ी सोच होगी और उस सोच को पूरा करने का जितना साहस और सामर्थ्य होगा वह उतना ही ऊपर सफलता की सीढ़ी चढ़ता जायेगा। लेकिन सफलता का रहस्य ख़ुशी में है , आनंद में है,उत्साह में है और वह भी खुद के बटोरने में नहीं बल्कि बाँटने में है। 
                                                                                   इन्द्रजीत सिंह कुर्राम