Wednesday, August 15, 2018

paisa chalta hai

paisa chalta hai
                                   पैसा चलता है 
एक आदमी बेरोजगार था और नौकरी की तलाश में बड़े शहर की तरफ निकल पड़ा। ट्रेन से उतरने पर उसे एक भिखारी मिला, जिसने बड़ी दुखी आँखों से उसे देखा और अपना हाथ उसके आगे कर दिया। उस आदमी ने कुछ सोचा और अपनी जेब से एक रुपया निकाल कर भिखारी के हाथ में रख दिया, और आगे बढ़ गया। भिखारी ने आदतन कुछ कहा और आगे बढ़ गया।भिखारी के पास एक रुपया और था, वह दो रूपये ले कर चाय वाले के पास गया और उसने दो रुपये की चाय पी ली। चाय वाले ने दो रूपये अपनी जेब में रखा और जब उस चाय वाले के पास बीस रुपये हो गए तो वह राशन की दुकान से एक किलो शक्कर ले आया। राशन दुकान में सेठ ने वह रूपये अपनी संदूक में रख लिए। सेठ के गल्ले में शाम तक हजार रूपये आ गए तो उसने उन रुपयों से तेल के पीपे ले लिए। तेल के पीपे वाले उस सेठ ने पर्याप्त पैसे हो जाने पर तेल निकालने वाली और बेचने वाली कंपनी से और माल मंगा लिया। इस तरह से उस बेरोजगार आदमी का एक रुपया एक हाथ से दूसरे हाथ होता हुआ आगे बढ़ता रहा।
उधर वह बेरोजगार आदमी काम की तलाश में दर- दर भटकता हुआ उस तेल बनाने वाली कंपनी तक पहुंच गया और उसे वहां तीन हजार रूपये महीने की नौकरी मिल गयी। काम करते -करते एक महीने बीत गए और उस आदमी को उसके काम की पहली पगार तीन हजार रूपये उसके हाथ में मिले।  रूपये हाथ में आने के बाद वो बहुत खुश हुआ और अपने इष्ट देव को धन्यवाद दे कहा " हे देव आपने आज से मुझे भी मेरी मेहनत की कमाई देना शुरू किया है, आशीर्वाद दो की मेरा यह धन अच्छे कार्यों में व्यय हो इस से  मेरा, मेरे परिवार का, मेरे समाज का, मेरे राष्ट्र का, विश्व का कल्याण हो। " इस तरह उस आदमी ने अपनी कमाई का सदुपयोग करना शुरू कर दिया। 
किसी को दिया गया धन या कहीं किया गया इन्वेस्टमेंट का एक रुपया भी कई गुना बढ़कर वापस ही मिलेगा। अगर हमने पैसे आने के बाद उसे कहीं भी इन्वेस्ट नहीं किया तो वह पैसा वहीँ रुक जायेगा वह बढ़ेगा नहीं। जिन स्थानों पर पैसों का लेन -देन जितनी तेजी से होता है वे स्थान ज्यादा प्रगति करते है अपेक्षा उन स्थानों के जहाँ पैसों का लेन देन कम होता है। 

Monday, January 15, 2018

bachpan kal, aaj aur kal


बचपन कल, आज और कल

"बचपन" इस शब्द को सुन कर मन प्रफुल्लित सा हो जाता है। मनुष्य जीवन का एक यादगार लम्हा जब वह इस सृष्टि में आ कर हॅसने-रोने के अलावा बोलना, चलना-फिरना, खेलना-कूदना आदि क्रियाओं के साथ अपने पैरों पर खड़ा होना सीखता है। बचपन की बचकानी हरकत, बचपन की शरारतें अच्छी हो या बुरी पर होती एकदम साफ मन से है। परन्तु बचपन कल और आज का बहुत बदल गया है, पहले हमारे पास समय था, हमारी इच्छाएं कम थी, हमारी परिधि कम थी, हमारी इच्छाओं का दायरा कम था, विज्ञान को समझने की कोशिश में थे, वस्तुओं के ब्रांड कम थे। इसलिए वो बचपन आज के बचपन से बिलकुल अलग था आज तेजी से बदलती इस दुनिया में किसी के पास पर्याप्त समय नहीं, खाने -पीने की ढेरों किस्में बाजार में उपलब्ध है,पर वो भूख और स्वाद नहीं, पहले हमारे पास मोबाइल नहीं था, टीवी के इतने सारे चैनल नहीं थे। सबसे बड़ी बात है की पहले किसी-किसी जगह ही कॉम्पिटिशन था, और आज हर जगह कॉम्पिटिशन देखने को मिलता है। हमारे बुजुर्गों का बचपन कैसे बिता? हमारा बचपन कैसे बिता? हमारे बच्चों का बचपन कैसे बीत रहा है? और उनके बच्चों का बचपन कैसा होगा? अगर आज इस पर ध्यान नहीं गया तो बचपन ही  समाप्त हो जायेगा। 
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है एक कच्चे मिटटी के घड़े जैसे, जिसे जिस आकर में ढालें ढल जाये। बाल मन को समझना आसान नहीं, क्योंकि एक बच्चा शब्दों-वाक्यों से परे सिर्फ भावनाओं को समझते है। कहते है बच्चों में भगवान् बसते है, और जिस प्रकार भगवान् भाव को समझते है उसी प्रकार बच्चे भी भाव ही समझते है। बाल मन को समझना आसान नहीं है फिर भी थोड़ा प्यार थोड़ा फटकार जरुरी है। बच्चों को यदि कुछ सिखाना चाहिए तो उन्हें जीवन जीने की कला सिखानी है। और जीवन को प्रकृति और प्रवृत्ति से सीखा जाना चाहिए। जिस प्रकार मौसम अलग-अलग है और प्रकृति मौसम के अनुसार व्यवहार करती है, जहाँ पतझड़ में वृक्ष अपने पत्ते त्याग देती है वहीँ पुनः बसंत में खुद को हरा -भरा कर लेती है। कभी तेज गर्मी तो कभी कड़ाके की सर्दी हर मौसम का अपना महत्व है। अगर प्रकृति में यह जलवायु परिवर्तन न हो या समय से न हो तो उसका सीधा असर अनाजों सब्जियों के पैदावार में पड़ता है, व्यक्ति के स्वास्थ पर पड़ता है। उसी प्रकार बच्चों को प्यार की जरुरत तो हमेशा रहती ही है पर उसके साथ साथ जरुरत पड़ने पर डांटना भी चाहिए, उनकी इच्छाओं की पूर्ति करना ठीक है पर इच्छाओं की अति पर लगाम होना चाहिए, उन्हें सुख सुविधाएं देना ठीक है पर उन्हें कठिन परिस्थितियों का बोध भी होना चाहिए। परन्तु आज हम क्या कर रहे है? अपने बच्चों के लिए हम बस और बस अच्छा और सबसे अच्छा ही चाह रहें है। हम चाह रहें है हमारा बच्चा सबसे अच्छे स्कूल में पढ़े, एग्जाम में वो सबसे अच्छे अंक अर्जित करे, खेल में भी सबसे आगे रहे, फिर डांस, म्यूजिक की क्लास भी जाये, टॉप के कॉलेज में एड्मिशन हो जाये, और टॉप की कंपनी में टॉप पोस्ट में सलेक्ट हो जाये। अरे बच्चा अभी ठीक से चलना भी नहीं सीख पाया है और हम उसका पूरा भविष्य देखने लग गए।अपेक्षाएं करना अच्छा है पर प्रकृति की उपेक्षा करना गलत है। एक समय था जब बच्चे लकड़ी, पत्थर, मिटटी से अपने खिलौने तलाश लेते थे, और आज कंप्यूटर टीवी और मोबाइल में गेम तलाशते है। पहले के बच्चे खेलते -खेलते पेड़ पर चढ़ जाते थे और फल तोड़कर खा जाते थे, कही भी नल में, हैंडपंप में या कुवें का पानी पीकर भी बीमार नहीं होते थे क्योंकि प्रदुषण कम था, और आज हाथ साफ कर खाने के बाद भी बीमार हो जाते है  क्योंकि प्रदुषण बहुत बढ़ गया है। हम खुद ही बच्चों को नाजुक बनाये जा रहे है जबकि प्रकृति ने उन्हें स्ट्रांग बनाये रखने की चीजें उपलब्ध करा रखी है, बस हम बच्चों को वहां पहुंचने नहीं देते। पहले बच्चे खुद ही भागते थे क्योंकि भागने में उन्हें मजा आता था, आज बच्चों को हम भगा रहें हैं ताकि वो मैडल ला सके। स्कूल में एडमिशन के समय पहले देखते थे की स्कूल पास में हो, बजट में हो सामर्थ्य में हो, और आज देखते हैं की स्कूल का मीडियम कौन सा है उसकी बिल्डिंग कितनी बड़ी है और उसका नाम कितना चल रहा है। पहले बच्चे स्कूल से निकल कर कुछ बड़ा कर जाते थे तो स्कूल का नाम रोशन होता था पर आज लोग ये सोच कर स्कूल चयन करते है की इस स्कूल से मेरे बच्चे का नाम रोशन होगा। आज के बच्चे ज्यादा तेज ज्यादा स्मार्ट है क्योकि उनको संस्कार देने वाले सिर्फ माता-पिता या गुरुजन ही नहीं बल्कि कंप्यूटर, मोबाइल और सोशल मिडिया भी उनके साथ है। 
अंत में बस इतना ही की बच्चों को केवल अच्छे साधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी देना है, मंजिल उन्हें खुद चयन करने दें बस उन्हें आप राह बताएं। दुनिया में बड़े-बड़े काम करने वाले बहुत है पर याद वे ही आते है जो अच्छे काम करते है। 
                                                                                                                                                                                                                                                                            इन्द्रजीत सिंह कुर्राम

Saturday, May 14, 2016

surat railway station

surat railway station

from surat railway colony on date 14/01/2014, f/5.6, 1/100 sec exposer, ISO 200, 55mm focal length
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Friday, December 25, 2015

aaryan

आर्यन
बात उन दिनों की है जब मै बेरोजगारी का अनुभव प्राप्त करते किसी नौकरी की तलाश में भटक रहा था। एक कंपनी थी जिसमे औजार बनते थे, वहां 1500 रूपए प्रति माह पर बात हो गयी। वहां मै केवल दो दिन ही काम पर गया, न पैसे कम ही थे न काम में कोई तकलीफ थी, फिर भी वहां मन नहीं लगा। अब फिर मै बेरोजगार था। एक मित्र की सहायता से मै एक स्कूल में पढ़ाने लगा 700 रूपए प्रति माह में। साइकिल से स्कूल जाता बच्चों को पढ़ाता और घर आकर खुद पढता। यहाँ पैसे कम जरूर थे परन्तु काम मेरे लिए संतोष दायक था, यहाँ मुझे दो सप्ताह हुए थे की एक मित्र की सहायता से मुझे एक दूसरा काम मिल गया। एक थर्मल पावर प्लांट तैयार हो रहा था इलेक्ट्रो स्टैटिक प्रिसिपिटेटर बनाने वाली एक कंपनी थी, मै वहां एक ठेकेदार के नीचे काम करने लगा। यहाँ पर मुझे 3000 रूपए प्रति माह तय किया गया। यहाँ से ही मुझे एक महीने काम करने पर 3000 रूपए मिले। कॉमिक्स किराये पर देकर, फोटोग्राफी कर और ट्यूशन देकर पैसे तो पहले भी बनाए थे परन्तु यह 3000 रूपए मेरी पहली कमाई थी। यहॉ भी मैं दो-तीन महीने ही काम कर पाया था और मन कुछ और करने को मचल रहा था अतः मैंने वह जॉब भी छोड़ दी और एक बैंक में एजेंट के रूप में काम करने लगा। बैंक का काम करते-करते मैंने न्यूज़-पेपर पर एक एड देखा और वहाँ बायो-डेटा लेकर चला गया और इंटरव्यू में सलेक्ट हो गया।
जब मैं इस जॉब के लिए रायपुर शहर के लिए निकला मेरे पास 1500 रुपए थे। घर से 200 किलो-मीटर दूर मैं जॉब करने आ गया।
मैं अपने सामान के साथ सीधे कंपनी में गया और ड्यूटी ज्वाइन कर काम में लग गया, मैंने अपने रहने की समस्या का किसी से जिक्र नहीं किया और शाम को ड्यूटी समाप्त होने पर मैं अपने सामान के साथ निकल पड़ा रहने का ठिकाना ढूंढने। मैं अस्थाई रहने के लिए किसी सस्ते से सस्ते लॉज की तलाश में था।  सामान लिए चलते -चलते मैं थक गया था, तभी एक रिक्शा मेरे पास आकर रुका। लड़के ने मुझसे पूछा  "कहाँ जायेंगे भैया " मैंने कहा  "नहीं ! … कहीं नहीं जाना है, मैं लॉज ढूंढ रहा हूँ "  उसने कहा  "चलिए न भैया मैं छोड़ दूंगा, कौन से लॉज में जायेंगे ?" मैंने कहा  "देखो अगर किसी सस्ते से लॉज में ले जा सकते हो तो बताओ"  उसने बैठने को कहा तो मैंने किराया पूछा, उसने तीस रूपए कहा मैंने कहा बहुत ज्यादा है, और मै आगे बढ़ने लगा तो उसने कहा भैया पच्चीस रूपये दे देना, मैंने कहा बीस रुपये में चलना है तो चलो, वह राजी हो गया और मैं रिक्शा में बैठ गया। मैं रिक्शा में बैठा और थोड़ी दूर गया तो उससे पूछा  "तुम्हारा नाम क्या है ?"  उसने अपना नाम आर्यन बताया। उसके बारे में  मैंने और जानकारी ली, उसने बतया वह ओडिशा से आया है और यहाँ पर उसके और भी रिलेटिव्स कुछ न कुछ काम धंधे में है। चलते-चलते  उसने भी मुझसे पूछा भैया आप कहाँ से आये है, आपको यहाँ कुछ काम है क्या ? मैंने कहा मै यहीं छत्तीसगढ़ का हूँ, और यहाँ पर काम के सिलसिले में आया हूँ।  वह मुझे पास  के ही एक लॉज में ले गया वहां 300 रुपये प्रति दिन किराया था, मैंने मना कर दिया। इसी तरह तीन-चार लॉज में हमने पता किया कहीं 300 तो कहीं 250 रुपये किराया था। मैंने आर्यन से कहा  "देखो आर्यन मेरे पास ज्यादा पैसे है नहीं और मुझे यहाँ कितने दिन रुकना पड़े पता नहीं। मुझे 100 रुपये किराया तक का लॉज चलेगा, पर शायद यह संभव नहीं, तुम एक काम करो मुझे रेलवे स्टेशन पर ही छोड़ दो मै रात वहीँ बिताऊंगा।" आर्यन ने कहा "भैया आप परेशान हो रहे हैं, रेलवे स्टेशन में आप सुरक्षित नहीं रहेंगे वहां पर आपका सामान चोरी हो सकता है और पुलिस वाले भी परेशान करते हैं। अच्छा एक काम करते है यहाँ से थोड़ी दूर मंत्रालय के पास मेरी माँ का होटल है वहां चल कर पहले खाना खाते हैं फिर माँ से कह कर कुछ बंदोबस्त करवाता हूँ।" मैं सोच रहा था की ये लड़का क्यों मुझे मेरे हाल पर छोड़ नहीं देता, क्यों ये मेरी समस्या के समाधान ढूंढ रहा है, इसमें जरूर इसका कोई स्वार्थ होगा, शायद किराया ज्यादा बनाने की सोच रहा होगा या कही ये मुझे ठगने के बारे में तो नहीं सोच रहा है। चलो जो भी हो मेरे पास कोई भी कीमती सामान तो है नहीं,ये सोचते मै उसके साथ चलता रहा और उससे बात कर उसके बारे में जानने की कोशिश करने लगा।
आर्यन ओडिशा के एक छोटे से गांव का था उसने जैसे-तैसे बारहवीं तक की पढाई पूरी कर ली थी। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण आज उसे इस शहर में आ कर रिक्शा चलाना पड़ रहा था।  यहाँ उसके गावं के और भी लोग थे जो किराये में रिक्शा ले कर अपनी जीविका चला रहे थे। वह भी अच्छी नौकरी करना चाहता था ,पर यह इतना आसान नहीं है जितना आसान सरकारी लेखा-जोखा में दर्शाया जाता है की स्कूल-कॉलेज की संख्या बढ़ गयी है, बेरोजगारी दर घट गयी है, लोगों को  रोजगार के बेहतर अवसर मिल रहे है। वास्तविकता इन सरकारी आंकड़ों से कोसों दूर है। पूछने पर उसने बताया की वह भी रात में देसी दारु पीया करता है क्योंकि दिन  भर शारीरिक परिश्रम से वो इतना थक जाता है की बिना पीये नींद ही नहीं आती। ये दारू भी अच्छी है जो भूत को भुलाने का काम करती है, भविष्य के चिंताओं को हरती है और वर्तमान में अच्छी आराम देती है।
मंत्रालय के बॉउंड्री वाल से लगे एक छोटे से गुमटी पर रिक्शा रुका, टीन और पोलीथीन से बने इस गुमटी में ही आर्यन की माँ का भोजनालय था जहाँ लोग सस्ते में खाना खाते थे। आर्यन ने अपनी माँ से खाना लगाने को कहा, उसकी बहन ने मुझे एक थाली में खाना परोस दिया। खाना स्टार वाले होटलों की तरह तो नहीं था परन्तु भूख भी लगी थी और 15 रुपये में इतना खाना की पेट को सुकून दे, बुरा भी तो नहीं था। मेरे खाना खाते तक आर्यन ने अपनी माँ को मेरी समस्या से अवगत करा दिया था। उसकी माँ मुझे पास के ही एक एस.टी.डी.-पी.सी.ओ.  के दुकान ले जाकर एक लॉज में फ़ोन लगाया, वहां एक कमरा खाली था। आर्यन को उसकी माँ ने पता दिया और मै रिक्शा में फिर चल पड़ा। हम लॉज में पहुंचे वहां 80 रुपये प्रति दिन किराया था, पर कुछ ही देर पहले कमरा बुक हो गया था। मैंने लॉज  वाले से पूछा क्या कल मुझे कमरा मिल जायेगा तो उसने कहा हाँ। मैंने वहां पास में ही एक दूसरा लॉज देखा 120 रुपये प्रति दिन  किराया था, कमरा ले कर सामान वहां रख कर मै निचे आर्यन के पास आया और उससे बोला "थैंक्स आर्यन तुमने मेरी आज बहुत मदद की है मेरी रहने की समस्या हल हो गयी है अब कल से मै यहाँ किराये का कमरा ढूंढ़ना शुरू कर दूंगा।  अच्छा अब बताओ तुम्हारा किराया कितना हुआ।" आर्यन ने कहा "भैया किराया रहने दो, आप इस शहर में नए-नए आये हो और अभी आपके रहने-खाने की उचित व्यवस्था भी नहीं है।" मुझे शर्मिंदगी हुई पहले वह मेरे लिए सिर्फ एक रिक्शा वाला था पर अब वह एक भाई एक दोस्त था। "फिर भी जो किराया बोला था वह तो ले लो " कह कर मैंने उसके हाथ में 30 रूपये रख दिए। आर्यन ने मुझे अपने घर के पास के एक दुकान का फ़ोन नम्बर दिया और अपना पूरा पता एक कागज पर लिख कर दिया और कहा की यदि उसके लिए भी कोई नौकरी हो तो बताये। आर्यन फिर मिलेंगे भैया कह कर चला गया और मै उसके बारे में सोचता लॉज के कमरे की तरफ बढ गया। 
दूसरे दिन मै काम पर गया फिर किराये में एक दस बाई दस का कमरा 800 रूपये महीने में देख कर वापस लॉज आ गया। दूसरे दिन लॉज छोड़ कर मै किराये के कमरे में आ गया। और ऑफिस के काम के दौरान पिकअप में सामान शिफ्ट करते वक़्त तेज हवा के झोकों ने मेरे कमीज की जेब से कुछ कागज हवा में उड़ा दिए।  उन कागजों के खो जाने का एहसास मुझे देर से हुआ और उन  कागजों में ही तो आर्यन का फ़ोन नम्बर और पता था जो अब मुझसे खो गया था। और एक हफ्ते ही मुझे बिलासपुर के ऑफिस में भेज दिया गया। मै आर्यन से दुबारा नहीं मिल पाया पर वो आज भी मुझे याद है। 
                                                                                                                                   इन्द्रजीत सिंह कुर्राम 

Saturday, September 12, 2015

mustard flower

              
a photography of mustard flower taken on the date of 17/02/2014 at Balco nagar Korba my home. camera model canan-EOS600D, f-stop f/8, exposure time 1/160 sec., ISO speed ISO-100, focal 55mm.

f-stop f/6.3, exposure time 1/125 sec., ISO speed  ISO-100, focal 55mm

http://indrajeetart.blogspot.com/2015/09/mustard-flower.html

Friday, June 26, 2015

nature-balco

This photograph taken by me on date 11/02/2013 06:58 AM at Balco nagar Korba, Chhatttisgarh, India by canon EOS 600D. F/7.1, ISO-100, exposer time 1/125sec.,focal length 55mm.
i just want to take some photographs near about my home, so I went ash dam of Balco in the morning, and I capture some natural signature there. but this one was the different to others. because we can see on this image lots of small due on the spiders net in grass.
F/7.1, 1/125 sec., ISO-100, 18 mm focal
F/7.1, 1/125 sec., ISO-100, 39mm focal

F/6.3, 1/100 sec., ISO-100, 55 mm focal

F/6.3, 1/100 sec., ISO-100, 47 mm focal
http://indrajeetart.blogspot.com/2015/06/nature-balco.html

Friday, January 2, 2015

NEW YEAR


नूतन वर्ष

आओ उगते सूरज से, हम सब आशीष लें.
जीवन में वह हमारे शक्ति, ज्ञान, प्रेम भर दे.
 सबका ही कल्याण करे, सबका ही सम्मान मांगे।
देश प्रेम का हो जज्बा, मिलकर ऐसा विचार मांगे।
अज्ञानता के अँधेरे में, ज्ञान प्रकाश फैला दे.
शत्रुता वाले मन में, मित्रता के बीज उगा दे.
आज से बुराइयों का, कर दे हम त्याग।
दिल से दिल मिला सब, प्रेम का गायें राग.
जैसा बिता गत वर्ष हमारा, अच्छा हो उससे यह वर्ष। 
गम से दूर रहकर अपने, मन में भर लेँ हर्ष।  
खुशियो का वर्ष, समृद्धि का वर्ष, प्रेम का वर्ष, उन्नति का वर्ष। 
सबके लिए हो आनंद वर्ष, सबको मुबारक नूतन वर्ष। 

                                                                                              इन्द्रजीत  सिंह कुर्राम (इन्द्रभान )